१२ साल बाद फिर से वो दिन आया है जो भारतीय जन मानस को उनकी आस्था का की जड़ो तक ले जाता है। हाँ हम बात कर रहे है हरिद्वार में शुरू हो रहे सदी के पहले महाकुम्भ की। हम इसको भारतीय संस्क्रती का ओलंपिक भी कह सकते है। ये वही उत्सव है जो हर बार एक नया आयाम स्थापित करता है लोगो के इकठा होने का । पिछली बार ये महाकुम्भ प्रयाग में हुआ था और वहां इकठा होने वाले लोगो की संख्या लगभग ८ करोड़ के आस पास थी , जो की पूरे "Australia" की जनसँख्या से कही जयादा है।
इसमें कोई दो राय नहीं नहीं है, पूरी भारतीय संस्कृति धर्म के धागों में बंधी हुई है। इतनी विविधता दुनिया के किसी भी देश में मिलना मुश्किल है। सारे देश से लोग आज इस पावन मौके पर हरिद्वार पहुचना चाहते होगे लेकिन उनमे से कुछ लोग ही ये सौभाग्य पायेगे।
जो लोग पहले हरिद्वार जा चुके है वो जानते होगे की, कितनी अलोकिक जगह है हरिद्वार। शब्द कम हो जायेगे अगर कोई हरिद्वार और गंगा की महिमा के बारे में बात करे।
हाँ, हम चाहते है की हम आज वहां होते, और हमारी इस इक्छा में धार्मिकता के साथ साथ कही एक दार्शनिक तथ्य भी है.
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